Sehore News: सीहोर। गरीब और गंभीर मरीजों के इलाज के लिए हर साल दिए जाने वाले मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान की राशि में बड़े फर्जीवाड़े और घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। भोपाल और सीहोर जिले के 10 से अधिक निजी अस्पतालों पर बिना किसी गंभीर बीमारी के फर्जी मरीज खड़े करके सरकार से करोड़ों रुपये की अनुदान राशि ऐंठने का संगीन संदेह है। इस पूरे गिरोह का नेटवर्क सीहोर और भोपाल के निजी अस्पतालों से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां संदिग्धों और फर्जी आवेदनों के तार खंगाले जा रहे हैं।
एक ही मोबाइल नंबर से 18-18 आवेदन
जांच के दौरान एक-दो नहीं, बल्कि 18 ऐसे फर्जी मोबाइल नंबर सामने आए हैं, जिनका इस्तेमाल अलग-अलग फर्जी मरीजों के नाम पर अनुदान हड़पने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह है कि एक-एक मोबाइल नंबर का उपयोग करके 17 से 18 फर्जी आवेदन जमा किए गए।
सीहोर जिले के कई निजी अस्पतालों की भूमिका इस पूरे घोटाले में बेहद संदिग्ध पाई गई है। आरोप हैं कि सीहोर और भोपाल के कुछ निजी अस्पतालों ने फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किए, सामान्य बीमारियों को गंभीर बताकर बढ़ा-चढ़ाकर एस्टिमेट बनाए और यहां तक कि कागजों पर ऑपरेशन दिखाकर मरीज को डिस्चार्ज भी कर दिया। अब प्रशासन और सीएम सचिवालय सीहोर के इन संदिग्ध अस्पतालों की अलग से विस्तृत जांच कर रहा है और दोषी पाए जाने पर इन्हें ब्लैकलिस्ट करने तथा संचालकों पर एफआईआर की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
ऐसे पकड़ में आया करोड़ों का फर्जीवाड़ा
यह फर्जीवाड़ा तब पकड़ में आया जब सरकार ने मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान का सालाना बजट 200 करोड़ से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये किया। इसके साथ ही मंजूरी की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए स्वेच्छानुदान पोर्टल को आयुष्मान भारत, समग्र आईडी और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के डिजिटल पोर्टल से इंटरलिंक किया गया।
जैसे ही सिस्टम में डेटा का मिलान शुरू हुआ, सॉफ्टवेयर ने तुरंत अलर्ट जारी कर दिया। एक ही मोबाइल नंबर का बार-बार इस्तेमाल होना और सीहोर.भोपाल के कुछ खास अस्पतालों से अचानक आवेदनों की बाढ़ आना अधिकारियों के गले नहीं उतरा। इसके बाद जब गहराई से जांच शुरू हुई तो करोड़ों रुपये के फर्जी भुगतान का जिन्न बाहर निकल आया। हालांकि जांच प्रभावित न हो इसलिए सीएम सचिवालय ने फिलहाल सीहोर और भोपाल के संदिग्ध अस्पतालों व मोबाइल नंबरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं।
फर्जीवाड़े पर नकेल कसने के लिए बने नए नियम
घोटाले के उजागर होते ही राज्य सरकार ने स्वेच्छानुदान की मंजूरी के नियमों को बेहद सख्त कर दिया है, जिनमें अब बिना मेडिकल एस्टिमेट, वास्तविक मेडिकल रिकॉर्ड, आधार कार्ड और समग्र आईडी के कोई भी आवेदन स्वीकार नहीं होगा। मंत्री, विधायक या सांसद का अधिकृत अनुशंसा पत्र अनिवार्य कर दिया गया है। आवेदन निरस्त या मंजूर होने पर मरीज, संबंधित अस्पताल और सिफारिश करने वाले जनप्रतिनिधि को सीधे एसएमएस व ईमेल से यूटीआर नंबर और राशि की सूचना भेजी जाएगी।
जांच टीम के सामने बड़ी चुनौतियां
फिलहाल अधिकारियों के सामने हर दिन आने वाले लगभग 200 से अधिक मामलों का फोन पर सत्यापन करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक-एक मरीज की जांच और अस्पताल के रिकॉर्ड खंगालने में 5 से 10 मिनट का समय लग रहा है। जांच में सामने आ रहा है कि सीहोर के कुछ इलाकों से आए आवेदनों में सामान्य सर्दी-बुखार या छोटी बीमारियों के भी फर्जी कागजात बनाकर लाखों का एस्टिमेट भेजा गया था।


