17 साल के सामूहिक प्रयासों से उपवन बना मंडी मुक्तिधाम

#Sehore, सीहोर। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का समय पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। अमूमन लोग इन दिनों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं, लेकिन सीहोर की मंडी मुक्तिधाम समिति, स्थानीय दानदाताओं और जागरूक नागरिकों ने अपने पूर्वजों की स्मृति को अमर बनाने के लिए जनसहयोग की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है, जो पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। सभी के साझा प्रयासों और 17 सालों की अनवरत देख-रेख का ही नतीजा है कि कभी वीरान दिखने वाला मंडी मुक्तिधाम आज 5 हजार से अधिक वृक्षों और फूलों की खुशबू से महकता हुआ हरा-भरा उपवन बन चुका है।
बता दें इस भगीरथ प्रयास की शुरुआत 17 साल पहले स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी राजेंद्र राठौर और उनके परिवार के एक निर्णय से हुई थी। माता-पिता के देहांत के बाद परिवार ने कुप्रथा बन चुके मृत्युभोज का आयोजन न कर, उस राशि से 1 लाख रुपये मुक्तिधाम के जीर्णोद्धार के लिए दान दिए। माता-पिता के प्रकृति प्रेम को देखते हुए वहां पौधे लगाने और परिसर को संवारने की नींव रखी गई।
समिति और जनसहयोग ने बदला मुक्तिधाम का स्वरूप
शुरुआती पहल के बाद मुक्तिधाम समिति के सदस्य और शहर के कई दानदाता इस पवित्र कार्य से जुड़ते चले गए। समिति के सदस्य राजेंद्र राठौर पिछले 17 वर्षों से रोजाना 3 से 4 घंटे यहां बिताकर पौधों की सिंचाई, छंटाई और खाद-पानी का ध्यान रखते हैं। धीरे-धीरे नगर पालिका, सामाजिक संस्थाओं और शहरवासियों के सहयोग से 10 एकड़ में फैले परिसर में आम, जामुन, चीकू, पपीता, नाशपाती जैसी 20 से अधिक प्रजातियों के फलदार व छायादार पेड़ तैयार हो गए। यहाँ आधा एकड़ में फैला गुलाब का बगीचा, चंपा, चमेली और रातरानी के पौधे आने वाले लोगों को सुकून पहुंचाते हैं।
दानदाताओं के सहयोग से जुड़ीं सुविधाएं
नागरिकों और दानदाताओं के खुले दिल से दिए गए सहयोग के कारण ही आज परिसर में श्रद्धालुओं के बैठने के लिए सीमेंट की कुर्सियां, ठंडे पानी के वाटर कूलर, दो सुंदर मंदिर, लकड़ी का विशाल गोदाम, मुंडन कक्ष और पानी की टंकियों जैसी बेहतर सुविधाएं विकसित हो सकी हैं। पूर्वजों की याद में फिजूलखर्च छोडक़र प्रकृति संरक्षण और जनसेवा का यह सामूहिक प्रयास आज पूरे शहर के लिए गौरव का विषय बन गया है।