सीहोर। देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 की क्रांति से भी 33 साल पहले मध्य प्रदेश की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की बड़ी चिंगारी सुलग उठी थी। यह कहानी है नरसिंहगढ़ रियासत के वीर राजकुमार कुंवर चैनसिंह की, जिन्होंने साल 1824 में सीहोर में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। अब इसी गौरवशाली इतिहास और अमर गाथा को सीहोर के युवा लेखक सुदर्शन व्यास ने अपने नए उपन्यास कंकड़ देवता के जरिए बेहद प्रभावी शब्दों में पिरोया है।
साहित्य जगत में अपनी एक खास पहचान बना चुके सुदर्शन व्यास की यह पांचवीं पुस्तक है। इससे पहले उनके तीन काव्य संग्रह और राजनीतिक विमर्श पर दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अपनी इस नई कृति कंकड़ देवता के माध्यम से उन्होंने इतिहास के उस महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित अध्याय को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है, जिसे आम जनमानस में उतनी पहचान नहीं मिल पाई जितनी मिलनी चाहिए थी। लेखक ने उपन्यास में कुंवर चैनसिंह के मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम, स्वाभिमान, अंग्रेजी हुकूमत की शर्तें मानने से साफ इनकार और सीहोर के दशहराबाग में हुए ऐतिहासिक संघर्ष का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है।
क्या कहती है कुंवर चैनसिंह की शौर्यगाथा
इतिहास के पन्नों के मुताबिक साल 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल रियासत के समझौते के बाद सीहोर में अंग्रेजी छावनी बनी थी। नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुंवर चैनसिंह ने अंग्रेजों की दखलंदाजी और अधीनता को स्वीकार करने से मना कर दिया था।
24 जुलाई 1824 को सीहोर में हुए इस भीषण संघर्ष में उन्होंने अपने वफादार साथियों हिम्मत खांए बहादुर खां और अन्य सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। हथियारों और संख्या में अंग्रेजों से कमजोर होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने के बजाय रणभूमि में वीरगति पाना बेहतर समझा। उनकी इसी शहादत के बाद वे मालवा अंचल के जनमानस में लोकदेवता के रूप में स्थापित हो गए। आज भी नरसिंहगढ़ में उनकी समाधि और सीहोर में उनकी छतरी पर उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
आम पाठकों तक आसानी से उपलब्ध है उपन्यास
लेखक सुदर्शन व्यास का यह उपन्यास उन सभी पाठकों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत है जो देश के स्वाभिमान और बलिदान की अनकही कहानियों को जानना चाहते हैं। यह उपन्यास ऑनलाइन माध्यम के साथ-साथ वेरा प्रकाशन के जरिए आसानी से खरीदा जा सकता है। सुदर्शन व्यास की इस पहल से नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत और माटी के वीर सपूतों के संघर्ष को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।


