कोसमी से भोपाल तक पदयात्रा जारी, 35 गांवों के हजारों आदिवासी कर रहे हैं पैदल मार्च

  • सीहोर। भैरूंदा तहसील के ग्राम कोसमी में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और खेत बर्बाद किए जाने के विरोध में आदिवासी समाज का आक्रोश खुलकर सडक़ों पर आ गया है। न्याय की मांग को लेकर करीब 2 दो से तीन हजार आदिवासियों ने गुरुवार सुबह 11 बजे से पदयात्रा की शुरुआत की है। इस पदयात्राम में युवाओं और पुरुषों के साथ-साथ बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल हैं। सुरक्षा के लिहाज से इस लंबी पदयात्रा के साथ पुलिस बल भी तैनात किया गया है।
    बता दें कोसमी से शुरू हुए इस पदयात्री कारवां की लंबाई करीब डेढ़ किलोमीटर तक नजर आ रही है। हाथों में बैनर और तख्तियां थामे प्रदर्शनकारी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। भीषण धूप और 80 किलोमीटर से अधिक लंबे सफर की परवाह किए बिना आदिवासी समाज के ये लोग अपने अधिकारों और उजड़े आशियानों को बचाने के लिए लगातार कदम बढ़ा रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलकर अपनी आपबीती सुनाएंगे और जमीन से जुड़े अपने पुराने दस्तावेज उनके सामने पेश करेंगे।
    क्यों भडक़ा है आदिवासियों का यह आंदोलन
    11 अक्टूबर को कोसमी गांव में वन विभाग और वन विकास निगम द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़ दिए गए थे और पीने के पानी के कुएं को मिट्टी से भर दिया गया था। इससे प्रभावित परिवारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। आदिवासी नेताओं का आरोप है कि केवल कोसमी ही नहीं, बल्कि खिवनी अभयारण्य क्षेत्र के 35 से अधिक गांवों जैसे इटावा खुर्द, नवलगांव, भीलखेड़ा, कुरी, बसंतपुर, लावापानी आदि में आदिवासियों को खेती करने से रोका जा रहा है।
  • केंद्रीय मंत्री शिवराज भी जता चुके हैं आपत्ति
    इस पूरे घटनाक्रम के तूल पकडऩे की एक बड़ी वजह यह भी है कि 11 अक्टूबर की कार्रवाई के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद पीडि़त परिवारों के बीच पहुंचे थे। उन्होंने इस कार्रवाई को अत्याचार की पराकाष्ठा करार देते हुए अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना दिया था। इसके अलावा स्थानीय विधायक रमाकांत भार्गव भी पीडि़तों से मिले थे। अब इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे रमेश बारेला ने स्पष्ट कर दिया है कि वे सिर्फ 12 परिवारों की बेदखली के खिलाफ नहीं, बल्कि अब 12 हजार से अधिक लोगों की आवाज बनकर सरकार के सामने न्याय की मांग कर रहे हैं।
    आदिवासियों की प्रमुख मांगें
  • बेदखली और तोडफ़ोड़ के जिम्मेदार वन अधिकारियों व कर्मचारियों पर तत्काल कड़ी कार्रवाई की जाए।
  • जिस वन भूमि पर वे पीढिय़ों से खेती कर रहे हैं, उसका वैध पट्टा उन्हें प्रदान किया जाए।
  • बेघर हुए 12 परिवारों के भोजन, स्वास्थ्य और रहने की उचित व्यवस्था की जाए तथा नष्ट हुई फसलों का पूरा मुआवजा दिया जाए।
    प्रशासन की रिपोर्ट में यह दावा
    दूसरी ओर वन विकास निगम और सीहोर कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में आदिवासियों के दावों को खारिज करते हुए इस कब्जे को अवैध बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2021 में वन विकास निगम ने 135 हेक्टेयर में 3.37 लाख से अधिक सागौन के पौधे लगाए थे। आरोप है कि इनमें से 78,700 पौधे काटकर 31.48 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर अतिक्रमण किया गया। भैरूंदा एसडीएम की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेदखल किए गए कब्जाधारियों के मूल गांवों में पहले से ही पक्के मकान और वोटर आईडी दर्ज हैं। प्रशासन ने कार्रवाई को सही ठहराने के लिए गूगल अर्थ की टाइमलाइन तस्वीरों और ड्रोन वीडियोग्राफी को साक्ष्य बनाया है, जिसके मुताबिक 2021 तक यह भूमि खाली थी। बावजूद इसके आदिवासी समाज इन प्रशासनिक रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर रहा है। पदयात्रा के जरिए राजधानी पहुंचे ये लोग 17 अक्टूबर को मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने की तैयारी में हैं।