सीहोर। स्मार्ट फोन की चमक और घरों का बढ़ता क्लेश जिले के मासूमों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है। सीहोर जिले में मोबाइल स्क्रीन की लत और माता-पिता के आपसी झगड़ों ने करीब 40 हजार बच्चों और किशोरों को उदासी और डिप्रेशन के दलदल में धकेल दिया है। इस चौंकाने वाली बात का खुलासा जिला अस्पताल स्थित राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत संचालित उमंग स्वास्थ्य केंद्र के ताजा आंकड़ों और केस स्टडीज से हुआ है।
उमंग क्लीनिक की टीम द्वारा इस साल स्कूलों, गांवों और अस्पताल पहुंचने वाले 40 हजार से अधिक बच्चों और उनके अभिभावकों से संवाद और काउंसलिंग की गई, जिसमें बच्चों के बिगड़ते दिमागी सेहत की गंभीर तस्वीर सामने आई है।
माता-पिता का झगड़ा और अकेलापन मुख्य वजह
काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि बच्चों में बढ़ते मानसिक तनाव की सबसे बड़ी वजह घर में रोज होने वाली किचकिच और माता-पिता का आपसी विवाद है। कई मामलों में किसी एक अभिभावक के घर छोडक़र चले जाने से बच्चे अंदर ही अंदर भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। घर में सुरक्षा और प्यार भरा माहौल न मिलने से मासूम खुद को असुरक्षित और अकेला महसूस करने लगते हैं, जिससे उनका पढ़ाई और खेलकूद से ध्यान हटने लगता है।
अकेलेपन का साथी बना मोबाइल, जो बाद में बना बीमारी
विशेषज्ञों के मुताबिक जब बच्चों को घर में अपनों से प्यार और बातचीत का माहौल नहीं मिलता तो वे अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए मोबाइल फोन का सहारा लेते हैं। कई बार माता-पिता भी अपनी व्यस्तता या झगड़ों से ध्यान हटाने के लिए खुद ही मासूमों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं।
काउंसलरों का कहना है कि मोबाइल की यह लत बच्चों को असली दुनिया और रिश्तों से पूरी तरह काट देती है। सोशल मीडिया और गेमिंग की वर्चुअल दुनिया बच्चों को शुरुआत में तो लुभावनी लगती है, लेकिन जब उनका सामना कड़वी सच्चाई से होता है तो वे हालात को संभाल नहीं पाते और गहरे तनाव में चले जाते हैं।
ब्लैकमेलिंग का भी बढ़ रहा खतरा
उमंग केंद्र की केस स्टडीज में यह बात भी सामने आई है कि किशोरावस्था में बच्चे अक्सर भावनात्मक भटकाव, गलत संगति, टॉक्सिक रिश्तों और ब्लैकमेलिंग का शिकार हो जाते हैं। मानसिक प्रताडऩा झेलने की स्थिति में कई बार किशोर इतने हताश हो जाते हैं कि वे आत्मघाती कदम उठाने तक की सोचने लगते हैं।
बच्चों को मोबाइल नहीं, अपना समय दीजिए
जिला अस्पताल के उमंग क्लीनिक के काउंसलर ममतेश राठौर और उनकी टीम लगातार स्कूलों और समुदायों में पहुंचकर बच्चों और अभिभावकों का मार्गदर्शन कर रही है।
अभिभावक ध्यान दें इन बातों पर…
बच्चों के सामने न झगड़ें: घर का माहौल शांत और खुशनुमा रखें। बच्चों के सामने आपसी मतभेद जाहिर करने से बचें।
मोबाइल टाइम घटाएं: बच्चों का मोबाइल देखने का समय तय करें और खुद भी उनके साथ समय बिताएं।
दोस्त बनकर बात करें: बच्चों से उनके दिनभर के अनुभव, स्कूल की बातें और उनकी परेशानियों पर खुलकर बात करें।
बदलाव दिखे तो सलाह लें: यदि बच्चा अचानक चुपचाप रहने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए या उदास दिखे तो बिना देर किए उमंग क्लीनिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लें।


