सीहोर। पिछले दिनों हुई बेमौसम बारिश, तेज आंधी और ओलावृष्टि ने जिले के किसानों की कमर तोड़ दी है। खेतों में सोने की तरह लहलहाती गेहूं की फसल देखते ही देखते जमीन पर बिछ गई। फसल आड़ी होने से किसानों के चेहरों पर मायूसी छा गई और साल भर की मेहनत मिट्टी में मिलती नजर आने लगी। ऐसे संकट के समय में न तो शासन के नुमाइंदे पहुंचे और न ही प्रशासन ने सुध ली, लेकिन समाजसेवी और किसान एमएस मेवाड़ा की एक नई सोच और ‘देसी जुगाड़’ ने अब किसानों को बर्बादी से बचाने की नई उम्मीद जगाई है।
जब फसल गिरने के बाद किसान टूट चुके थे, तब एमएस मेवाड़ा ने अपनी सूझबूझ से एक तरीका निकाला। उन्होंने खेतों में गिरी फसल को उठाकर रस्सियों के सहारे छोटे-छोटे गुच्छों में बांधकर खड़ा करना शुरू किया। रामाखेड़ी के किसान मोतीलाल मेवाड़ा ने इसे प्रयोग के तौर पर अपनाया। एक एकड़ खेत में 6 मजदूरों ने दो दिन मेहनत की, जबकि दो एकड़ में करीब 12 मजदूरों और 4000 रुपये के खर्च से फसल को वापस खड़ा कर दिया गया। जहां फसल गिरने से 40 क्विंटल की जगह मात्र 10 क्विंटल पैदावार की उम्मीद बची थी, वहीं इस तकनीक से अब 20 क्विंटल से अधिक गेहूं बचने की संभावना है। यानी महज कुछ हजार रुपये खर्च कर किसान अपनी 50 हजार से ज्यादा की फसल बचा रहे हैं।
प्रशासन की बेरुखी से किसानों में नारोजगी
समाजसेवी एमएस मेवाड़ा और स्थानीय किसानों ने प्रशासन के प्रति गहरा असंतोष व्यक्त किया है। किसानों का कहना है कि खेतों में फसल बर्बाद पड़ी है, लेकिन अभी तक कोई पटवारी, गिरदावर या कृषि विभाग का अधिकारी सर्वे करने नहीं पहुंचा। किसानों ने विगत दिनों करनाल और पीलूखेड़ी जैसे गांवों में प्रदर्शन भी किया, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। अब किसान अपनी फसल बचाने के लिए दोहरी मार झेल रहा है, एक तरफ कुदरत का कहर और दूसरी तरफ मजदूरों का अतिरिक्त खर्च।
सीएम और कृषि मंत्री से गुहार
एमएस मेवाड़ा, देव सिंह मेवाड़ा, महेश, रमेश चंद, राधेश्याम और प्रहलाद जैसे किसानों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मांग की है कि तत्काल प्रभाव से फसलों का सर्वे कराया जाए। रामाखेड़ी के किसान मोहन जिनकी 5 एकड़ फसल पूरी तरह आड़ी हो गई है, उन्होंने जिला प्रशासन से राहत राशि और बीमा क्लेम दिलाने की पुरजोर मांग की है।
हौसले से हारी मुश्किलें
मेवाड़ा की यह पहल अब गांव-गांव में सोशल मीडिया के माध्यम से वायरल हो रही है। किसान अब सरकारी मदद के भरोसे बैठने के बजाय खुद अपनी मेहनत को सहेजने में जुट गए हैं। रलावती और रामाखेड़ी के खेतों में फिर से खड़ी होती फसल इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे मजबूत हों तो किसान आंधी तूफान का मुकाबला भी अपने हौसले से कर सकता है।


