Sehore News: सीहोर। जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों के भविष्य को संवारने के नाम पर ऐसा खेला गया, जिसने शिक्षा व्यवस्था की नींव तक हिला दी है। स्कूलों की मरम्मत और कायाकल्प के लिए सरकार द्वारा जारी लाखों रुपये कथित तौर पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। कहीं बिना जरूरत दीवारें तुड़वाई गईं, कहीं नए गेट लगाकर पुराने हटाए गए तो कहीं कागजों में ही मरम्मत पूरी दिखाकर सरकारी खजाने से रकम निकाल ली गई। सबसे बड़ा खुलासा बिलकिसगंज संदीपनी स्कूल से हुआ है, जहां प्राचार्य द्वारा राशि लेने से इनकार करने के बावजूद फंड को दूसरे स्कूल में खपाने का मामला सामने आया है। अब यह पूरा घोटाला जिलेभर में चर्चा और गुस्से का विषय बन गया है।
नई बिल्डिंग थी, फिर भी मरम्मत के नाम पर खेल
बिलकिसगंज संदीपनी स्कूल में नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था। ऐसे में स्कूल के प्राचार्य पवन शर्मा ने साफ तौर पर विभाग को लिखित में बताया कि उन्हें मरम्मत राशि की आवश्यकता नहीं है। लेकिन आरोप है कि शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने इस फंड को भी नहीं छोड़ा। कथित तौर पर इस राशि को श्यामपुर के एक सरकारी स्कूल में मरम्मत के नाम पर खर्च दिखाकर ठिकाने लगा दिया गया। प्राचार्य का पत्र अब पूरे मामले में सबसे बड़ा दस्तावेज माना जा रहा हैए जिसने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जबरन लिखवाए गए ‘काम पूरे होने’ के कागज
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कई स्कूलों में वास्तव में मरम्मत की जरूरत ही नहीं थी। बावजूद इसके अधिकारियों द्वारा स्कूल प्राचार्यों पर दबाव बनाकर काम पूरा होने के दस्तावेज तैयार करवाए गए। सूत्र बताते हैं कि कुछ स्कूलों में केवल दिखावे के लिए दीवारें तुड़वाई गईं और दोबारा बनवाई गईं। कहीं पुराने लेकिन सही हालत वाले गेट हटाकर नए गेट लगा दिए गए। कई जगहों पर केवल खानापूर्ति कर फोटो खींचे गए और फाइलों में लाखों का काम पूरा दिखा दिया गया।
गरीब बच्चों के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट
शासन द्वारा प्रत्येक स्कूल को लगभग साढ़े पांच लाख रुपये की राशि जारी की गई थी। उद्देश्य था कि सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले गरीब बच्चों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। लेकिन हकीकत में कई स्कूलों में काम अधूरा पड़ा है, जबकि कई जगह घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ। स्थिति इतनी खराब है कि नई टाइल्स और पुताई कुछ ही दिनों में उखडऩे लगी। बच्चों को सुरक्षित और बेहतर माहौल देने का सपना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।
आधे-अधूरे काम, लेकिन पूरा भुगतान
इस पूरे घोटाले में पूर्णता प्रमाण पत्र सबसे बड़ा हथियार बनकर सामने आया है। नियमानुसार जब तक विभागीय इंजीनियर और सत्यापन टीम काम से संतुष्ट न हो जाए, तब तक अंतिम भुगतान नहीं किया जा सकता। लेकिन आरोप है कि यहां अधूरे और विवादित कार्यों को भी पूर्ण घोषित कर दिया गया। पुर्जी तरीके से पूर्णता प्रमाण पत्र जारी किए गए और लाखों रुपये की पूरी राशि निकाल ली गई।
जांच के आदेश, दोषियों पर कार्रवाई की बात
जिला शिक्षा अधिकारी संजय सिंह तोमर ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि उच्च स्तर से जांच के आदेश प्राप्त हुए हैं। डीपीसी के सहायक यंत्री को मूल्यांकन और तकनीकी जांच के निर्देश दिए गए हैं। जांच रिपोर्ट में जो भी तथ्य और खामियां सामने आएंगी, उनके आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


