@सीहोर। अयोध्या के रामलला और तिरुपति के बालाजी की तरह सीहोर के सीवन नदी तट पर विराजे बाल गोपाल का स्वरूप भी बेहद दिव्य और अलौकिक है। बडिय़ाखेड़ी स्थित ऐतिहासिक बड़ा मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण राघवेंद्र सरकार के नाम से विराजित हैं। शालिग्राम (काले पत्थर) से निर्मित इनकी सम्मोहक प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि यहां विराजे कान्हा को बच्चों की तरह खिलौने और झुनझुने बेहद प्रिय हैं।
राघवेंद्र सरकार का स्वरूप पूर्णत: बाल रूप में है, जिसके कारण श्रद्धालुओं का उनके प्रति गहरा वात्सल्य भाव रहता है। जब भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं तो वे आभार व्यक्त करने के लिए बाल गोपाल को सुंदर वस्त्र, तरह-तरह के खिलौने और झुनझुने अर्पित करते हैं। श्रद्धालु जब भगवान के सामने झुनझुना बजाते हैंए तो उसकी छनछन से पूरा मंदिर परिसर गूंज उठता है।
रहस्यमयी है काले पत्थर की यह दुर्लभ प्रतिमा
यह पावन मंदिर पेशवा काल से भी प्राचीन माना जाता है। शालिग्राम शिला से तराशी गई कान्हा की यह दुर्लभ प्रतिमा यहां कब और कैसे स्थापित हुई, इसका सटीक इतिहास आज भी रहस्यमय है। मान्यता है कि सदियों पहले देशभर से सिद्ध संत और बड़े-बड़े महंत अपनी साधना और विश्राम के लिए सीवन नदी के इस शांत व पवित्र तट पर आया करते थे।
संरक्षण की दरकार
सीवन नदी के तट पर 8 एकड़ के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह मंदिर परिसर अपनी अद्भुत ऐतिहासिक है। यहां बारीक नक्काशी वाली प्राचीन छतरियां और बारादरी बनी हुई हैं। हालांकि इतना ऐतिहासिक और अनूठा धाम होने के बावजूद यह मंदिर वर्तमान में अनदेखी का शिकार है। श्रद्धालुओं का कहना है कि शासन के धर्मस्व विभाग को इस प्राचीन धरोहर के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
6 दिनों तक झूले में दर्शन देंगे भगवान
जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। जन्माष्टमी की मध्यरात्रि 12 बजे कान्हा का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। मंदिर के पुजारी कल्याणदास बाबा ने बताया कि जन्माष्टमी से भगवान राघवेंद्र सरकार को एक भव्य झूले में विराजमान किया गया है। बाल गोपाल लगातार 6 दिनों तक झूले में ही भक्तों को दर्शन देंगे। इस दौरान प्रतिदिन विशेष पूजा, महाभोग और व्यापक स्तर पर कन्या भोज का आयोजन होगा। छठवें दिन धार्मिक विधि-विधान के साथ भगवान को झूले से उठाकर पुन: गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।


