Sehore News: सीहोर। सीहोर विधानसभा क्षेत्र का एक ऐसा गांव, जिसने जिले की राजनीति की दिशा बदल दी, आज खुद बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। यह गांव है डोबरा, जो भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक स्वर्गीय मदनलाल त्यागी का गृह ग्राम है। यह वही मदनलाल त्यागी हैं, जिनके विधायक बनने के बाद से सीहोर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ऐसी पिटी कि आज तक जीत को तरस रही है। भाजपा के इस अभेद्य गढ़ और पूर्व विधायक के गांव में आज हालात ये हैं कि भीषण गर्मी और नौतपा के बीच करीब एक हजार की आबादी पानी के एक-एक घूंट के लिए जद्दोजहद कर रही है।
बता दें लगभग एक हजार की आबादी वाले डोबरा गांव में सरकारी दावों की पोल खुल चुकी है। गांव में कुल 10 सरकारी हैंडपंप हैं, जिनमें से 9 पूरी तरह सूख चुके हैं। एकमात्र चालू हैंडपंप का जलस्तर भी इतना नीचे चला गया है कि उसमें से रुक-रुक कर थोड़ा-बहुत पानी आता है। डोबरा कॉलोनी के गरीब और मजदूर परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण ये परिवार निजी बोरिंग नहीं करा सकते और करीब 100 परिवार पूरी तरह सरकारी हैंडपंपों के भरोसे हैं। ग्रामीणों को अपनी रोजी-रोटी और जरूरी काम छोडक़र घंटों हैंडपंप पर कतार में खड़ा रहना पड़ रहा है। कई लोग साइकिल और बाइकों पर बर्तन बांधकर किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं।
2024 की ‘नर्मदा परियोजना’ आज भी अधूरी
गांव में पेयजल संकट को स्थाई रूप से खत्म करने के लिए साल 2024 में जल निगम द्वारा नर्मदा पाइपलाइन परियोजना स्वीकृत की गई थी। लेकिन ठेकेदार की मनमानी और कछुआ चाल के कारण आज 2026 में भी पूरे गांव में लाइन नहीं बिछाई जा सकी है। पानी की टंकी का निर्माण कार्य भी सालों से अधूरा पड़ा है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि ठेकेदार अपनी मर्जी से काम कर रहा है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है, जिसके कारण उन्हें हक का नर्मदा जल नसीब नहीं हो पा रहा है।
पंचायत के पास फंड है, लेकिन पीएचई ने नई बोरिंग पर लगाई रोक
इस पूरे मामले में प्रशासनिक संवेदनहीनता भी सामने आई है। ग्रामीणों के मुताबिक ग्राम पंचायत के पास लाखों रुपए का फंड मौजूद है जिससे नया बोरिंग या हैंडपंप लगाया जा सकता है। लेकिन जनपद पंचायत और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने यह कहकर नई बोरिंग पर रोक लगा दी है कि गांव में जल निगम की नर्मदा लाइन का काम चल रहा है।
अफसर का तर्क, लक्ष्य कम मिले हैं
इस अजीबोगरीब अड़ंगे और जलसंकट के संबंध में जब पीएचई विभाग के कार्यपालन यंत्री प्रदीप सक्सेना का कहना है कि इस वर्ष शासन से नए बोरिंग के लक्ष्य कम मिले हैं। उन्होंने अजीब सा तर्क देते हुए कहा कि यदि बहुत अधिक आवश्यकता होगी, तभी नए बोरिंग कराए जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि क्या 10 में से 9 हैंडपंप सूख जाना और एक हजार की आबादी का प्यासा मरना पीएचई विभाग के लिए बहुत अधिक आवश्यकता की श्रेणी में नहीं आता। पूर्व विधायक के गांव की यह दुर्दशा जिले के प्रशासनिक समन्वय और विकास के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।


