Sehore News: सीहोर। मध्य प्रदेश की राजनीति के केंद्र बिंदु कहे जाने वाले सीहोर शहर में इन दिनों एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है, क्या पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जसपाल सिंह अरोरा ने अपनी सियासी गतिविधियों पर विराम लगा दिया है। कभी शहर की राजनीति की धुरी माने जाने वाले अरोरा की लंबी खामोशी ने समर्थकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
बता दें जसपाल सिंह अरोरा की राजनीतिक यात्रा बेहद प्रभावशाली रही है। उन्होंने मंडी क्षेत्र के तत्कालीन वार्ड क्रमांक 17 से एक पार्षद के रूप में अपने सफर की शुरुआत की थी। अपनी मेहनत और जनसंपर्क के दम पर वे न केवल खुद नगर पालिका अध्यक्ष बने, बल्कि उनकी पत्नी अमिता अरोरा भी नगर पालिका अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। इसके बाद अरोरा ने जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर आसीन होकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत की।
बस्तियों और निर्धन परिवारों के ‘सुपर हीरो’
सीहोर की राजनीति में यह बात जगजाहिर है कि जसपाल सिंह अरोरा उस तबके की पहली पसंद रहे हैं, जो चुनाव में हार-जीत का फैसला करता है। बस्तियों में रहने वाले परिवार और निर्धन वर्ग के बीच अरोरा की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। उन्हें जमीन से जुड़ा नेता माना जाता है, जो सीधे आम आदमी की पहुंच में रहते थे। बता दें यही वह बड़ा वोट बैंक है जो शहर की राजनीति की दिशा और दशा तय करता है।
बदला अंदाज, पहले तेवर, अब खामोशी
एक दौर वह था जब शहर की कोई भी छोटी-बड़ी समस्या हो, जसपाल सिंह अरोरा सबसे पहले सडक़ों पर नजर आते थे। चाहे प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलना हो या जनता की लड़ाई लडऩा, वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखते थे। लेकिन बीते लंबे समय से अरोरा राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर बिल्कुल शांत नजर आ रहे हैं। हालांकि वह व्यक्तिगत कार्यक्रमों में जरुरत सम्मिलित हो रहे हैं। विधानसभा क्षेत्र का अंचल हो या शहर में वह हर धार्मिक आयोजनों पर और शादी-विवाह या रसोई कार्यक्रमों में पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
क्या हैं इस खामोशी के मायने
राजनीतिक जानकारों के बीच इस बात को लेकर कयासबाजी तेज है कि क्या अरोरा ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली है या फिर यह किसी बड़े सियासी तूफान से पहले की शांति है। शहर में चर्चा है कि क्या इतने असरदार नेता ने वास्तव में अपनी गतिविधियों पर विराम लगा दिया है या वे पर्दे के पीछे से किसी नई रणनीति पर काम कर रहे हैं।
फिलहाल, जसपाल सिंह अरोरा की चुप्पी ने सीहोर की राजनीति में एक खालीपन पैदा कर दिया है। उनके समर्थक आज भी अपने नेता की सक्रियता का इंतजार कर रहे हैं, जबकि विरोधी इस खामोशी के पीछे की वजह खोजने में जुटे हैं।


