- सीहोर। दीपावली के पावन पर्व पर जहां हर तरफ रोशनी और सजावट की तैयारियां जोरों पर हैं, वहीं फूलों की खेती करने वाले अन्नदाता के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है। इस बार त्योहारी सीजन में गेंदे के फूल की खेती किसानों को पूरी तरह दगा दे गई है। धनतेरस के दिन मंडी में बंपर आवक और कम मांग के कारण गेंदे का फूल महज 10 रुपए प्रति किलो के औने-पौने दाम पर बिका। इससे किसानों के लिए फसल की लागत और तुड़ाई का खर्च तक निकालना मुश्किल हो गया है।
सब्जी मंडी में गेंदे के फूल लेकर पहुंचे किसानों का कहना है कि शुक्रवार को धनतेरस के मौके पर शुरुआत में गेंदे के भाव 40 से 42 रुपए प्रति किलो तक रहे। लेकिन जैसे-जैसे फूलों की आवक बड़ी भाव लुढक़कर 10 रुपए किलो पर आ गए। किसानों के मुताबिक धनतेरस के दिन तो महज 25 प्रतिशत किसान ही अपने खेतों से फूल तोडक़र मंडी लेकर आए थे, जब 25 प्रतिशत आवक में ही भाव मिट्टी के मोल हो गए तो शनिवार और दीपावली के दिन जब बाकी बचे 75 प्रतिशत गेंदे के फूल मंडी में आएंगे, तब दामों का क्या हाल होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
लागत बढ़ी, मेहनत बढ़ी पर मुनाफा हुआ गायब
पचामा स्थित किसान मनीष यादव ने बताया कि उनके पड़ोसी किसान ने आधा एकड़ में गेंदे की खेती की है। इस बार खेती में खर्च और देखरेख दोनों काफी बढ़ गए हैं। मनीष ने बताया कि अब बीजों की जगह सीधे गेंदे के पौधे खरीदे जाते हैं, जो करीब 3 रुपए प्रति पौधा पड़ते हैं। आधा एकड़ में लगभग ढाई हजार पौधे लगाए गए हैं। गेंदे की फसल तैयार करने में कम से कम तीन बार खाद देनी पड़ती है और समय-समय पर निंदाई-खुदाई का खर्च उठाना पड़ता है।
अब कीटनाशकों दवाओं का भी खर्चा बढ़ा
मनीष यादव ने बताया कि पहले गेंदे की फसल में कभी कीटनाशक दवाइयां नहीं डालनी पड़ती थीं, लेकिन बीते दो-तीन सालों से बीमारियों के कारण बार-बार महंगी दवाइयों का छिडक़ाव करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि आधा एकड़ जमीन में करीब 6 से 7 क्विंटल गेंदे के फूलों की पैदावार होती है, जबकि इसे तैयार करने में 18 से 20 हजार रुपए का खर्च आ जाता है।
ग्राहकों के लिए सस्ती, किसानों के लिए नुकसान
अगर बीते वर्ष की बात करें तो त्योहारी सीजन में गेंदे के फूल की एक माला आराम से 20 से 30 रुपए तक बिकी थी, जिससे किसानों को अच्छी खासी बचत हो जाती थी, लेकिन इस बार थोक मंडी में भाव बुरी तरह गिरने के कारण बाजार में भी फूल और मालाएं काफी कम दाम में मिलने की उम्मीद है। धनतेरस-दीपावली पर फूलों के इस तरह औने-पौने दाम होने से किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। मंडी तक फूल लाने का भाड़ा और मजदूरों की दिहाड़ी भी अपनी जेब से भरने की नौबत आ गई है।


