अश्वगंधा से सीहोर के किसान मालामाल

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सीहोर। मध्यप्रदेश का सीहोर जिला अब पारंपरिक खेती से आगे बढक़र औषधीय खेती के एक बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। पानी की कमी और फसलों की बढ़ती लागत से जूझ रहे किसानों के लिए अश्वगंधा की खेती एक वरदान साबित हो रही है। इस बदलाव में आईटीसी चौपाल सागर की वैज्ञानिक तकनीक और मार्गदर्शन की अहम भूमिका है, जिससे किसान कम लागत और कम पानी में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।
सीहोर जिला वर्तमान में अश्वगंधा आधारित औषधीय खेती के एक उभरते हुए क्लस्टर के रूप में विकसित हो रहा है। आईटीसी चौपाल सागर द्वारा किसानों को उन्नत किस्म के बीज, वैज्ञानिक पद्धतियां और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आईटीसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर नागेंद्र मिश्रा समय-समय पर खेतों का निरीक्षण कर किसानों को तकनीकी बारीकियां सिखा रहे हैंए जिससे जड़ों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
इन किसानों ने पेश की मिसाल
ग्राम झालकी इछावर के किसान देवेंद्र पालीवाल ने आईटीसी के माध्यम से अश्वगंधा की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि यह फसल कम जोखिम वाली है और इसमें जल की आवश्यकता बहुत कम होती है, जिससे आय में स्थिरता बनी रहती है।
ग्राम गुलखेड़ी श्यामपुर के किसान महेश मालवीय ने वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर अपनी फसल की गुणवत्ता को बेहतर किया है, जिससे उन्हें बाजार में उचित मूल्य प्राप्त हो रहा है।
ग्राम शेखपुरा: किसान विनोद विश्वकर्मा पिछले दो सालों से पांच एकड़ में अश्वगंधा उगा रहे हैं। उनके अनुसार इस फसल में कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे खेती की लागत काफी घट गई है।
क्यों लोकप्रिय हो रही है अश्वगंधा
वैज्ञानिकों का मानना है कि अश्वगंधा की फसल सीमित जल संसाधनों में भी सफल होती है। पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं या सोयाबीन की तुलना में इसकी उत्पादन लागत कम है और औषधीय गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। आईटीसी चौपाल सागर न केवल प्रशिक्षण दे रहा है बल्कि पारदर्शी विपणन व्यवस्था के जरिए किसानों को सीधे बाजार से भी जोड़ रहा है।