सीहोर। आज के बदलते दौर में जहां त्योहारों का स्वरूप दिखावे और फूहड़ता की ओर झुक रहा है, वहीं सीहोर का सूर्यवंशी समाज अपनी पुरानी परंपराओं, मर्यादा और लोक संस्कृति को सहेजने की मिसाल पेश कर रहा है। शहर के फ्रीगंज क्षेत्र में होली के आगमन के साथ ही बुंदेलखंडी लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगी है। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच यहाँ की गलियों में आज भी ढोलक, नगडिय़ा, झांझ-मंजीरे और खंजड़ी की थाप पर फाग की टोलियां जम रही हैं।
बता दें सूर्यवंशी अहिरवार समाज के लोग वर्षों पुरानी इस साझी विरासत को आज भी पूरी पवित्रता के साथ आगे बड़ा रहे हैं। फाग गायक सरजू प्रसाद सूर्यवंशी बताते हैं कि पहले के समय में होली का डांडा गडऩे के दिन से ही फाग गायन शुरू हो जाता था, लेकिन समय के साथ अब इसमें कुछ बदलाव आए हैं। इसके बावजूद होलिका दहन से लेकर रंग पंचमी तक पूरे पांच दिनों तक फाग गायन का उत्साह बना रहता है। इन लोकगीतों में केवल हंसी मजाक नहीं, बल्कि रामायण, महाभारत, देवी गीत और शिव गणेश की स्तुतियां भी शामिल होती हैं।
शोक का रंग, सबसे पहले
इस समाज की सबसे सुंदर और मानवीय परंपरा शोक का रंग है। होली के पर्व पर खुशियां मनाने से पहले समाज की टोलियां उन परिवारों के घर पहुंचती हैं, जिन्होंने पिछले एक वर्ष में अपने किसी प्रियजन को खोया है। इसका मुख्य उद्देश्य शोक संतप्त परिवार को दुख के माहौल से निकालकर पुन: खुशियों के रंगों में शामिल करना होता है। समाज के लोग सबसे पहले इन परिवारों पर रंग डालते हैं और फिर पूरे मोहल्ले में होली की शुरुआत होती है। यह परंपरा आपसी जुड़ाव और संवेदनशीलता की अनूठी मिसाल है।
नई पीढिय़ों पर भी चढ़ा रंग
फ्रीगंज क्षेत्र में फाग, राई, स्वांग और ढिमरयाई शैली में गायन का कार्यक्रम चलता है। हालांकि बुजुर्गों का मानना है कि नई पीढ़ी का झुकाव मोबाइल और आधुनिक संगीत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन सूर्यवंशी समाज में आज भी युवा अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर इन कलाओं को सीख रहे हैं। स्थानीय निवासी बाबूलाल सूर्यवंशी ने बताया कि यह गायन मंडलियां केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को आपस में जोडऩे का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
दिखावे से दूर, पवित्रता के करीब
समाज के प्रबुद्धजनों का कहना है कि होली केवल हुड़दंग का नाम नहीं हैए बल्कि यह लोकगीतों के माध्यम से अपनी जड़ों से जुडऩे का पर्व है। बुंदेलखंडी लोकगीतों की मधुर गूंज के साथ सूर्यवंशी समाज यह संदेश दे रहा है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो आधुनिक युग में भी अपनी गौरवशाली लोक संस्कृति को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है।


