साइकिल से वैनिटी वैन तक, सीहोर वाले महाराज का फर्श से अर्श तक का सफर

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सीहोर। कहते हैं कि यदि महादेव की कृपा और मेहनत का संगम हो जाए तो नियति बदलते देर नहीं लगती। कुछ ऐसी ही कहानी है विख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा की। आज भले ही उनकी कथाओं में लाखों की भीड़ उमड़ती हो और उनका काफिला किसी फिल्मी सुपरस्टार की तरह निकलता हो, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे दशकों का कड़ा संघर्ष छिपा है। सीहोर की गलियों में पैदल घूमने वाले प्रदीप मिश्रा आज ‘काले रंग’ की अत्याधुनिक लग्जरी वैनिटी वैन के मालिक हैं।
बता दें साल 1980 में सीहोर के एक साधारण परिवार में जन्मे प्रदीप मिश्रा का बचपन अभावों में बीता। उनके पिता स्वर्गीय रामेश्वर दयाल मिश्रा परिवार चलाने के लिए चाय की दुकान चलाते थे और साइकिल पर कपड़े की फेरी लगाया करते थे। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि प्रदीप मिश्रा को बचपन से ही जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं। उन्होंने न केवल पिता की चाय की दुकान पर हाथ बंटाया, बल्कि घर खर्च के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और सिलाई का काम भी किया। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने एक निजी स्कूल में शिक्षक के रूप में भी सेवाएं दीं।
फिल्मी सितारों जैसी लग्जरी वैनिटी वैन
आज पंडित प्रदीप मिश्रा की जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है। वे अब एक काले रंग की भव्य वैनिटी वैन में सफर करते हैं। यह वैन किसी बॉलीवुड सुपरस्टार की बस की तरह आरामदायक है। लंबी यात्राओं और कथा के दौरान विश्राम के लिए वे इसी ‘चलते फिरते घर’ का उपयोग करते हैं। जिस शख्स के पास कभी खुद की साइकिल नहीं थी, आज उनके पास लग्जरी गाडिय़ों का बड़ा काफिला है, जिसे वे महादेव का आशीर्वाद मानते हैं।
गुरु की दीक्षा और ‘एक लोटा जल’ का जादू
प्रदीप मिश्रा के कथावाचक बनने का सफर गुरु श्री विठ्ठलेश राय काका जी की दीक्षा से शुरू हुआ। सीहोर के एक छोटे से मंदिर से शुरू हुई शिव पुराण की कथा आस्था चैनल के माध्यम से घर-घर तक पहुंच गई। उनके सरल उपाय, विशेषकर एक लोटा जल, हर समस्या का हल ने उन्हें आम लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। आज सीहोर का कुबेरेश्वर धाम न केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां से गौशाला और नि:शुल्क अन्नक्षेत्र का संचालन भी किया जा रहा है।