Sehore: संकट में सीहोर का शरबती…

09 sehore photo 01

Sehore News: सीहोर। जिला सीहोर जिसे पूरे भारत में ‘शरबती गेहूं’ के भंडार के रूप में जाना जाता है, आज अपनी इसी खास पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। कभी खेतों में लहलहाने वाला सुनहरी चमक वाला शरबती गेहूं अब सरकारी आंकड़ों में सिमटता जा रहा है। कृषि विभाग के हालिया आंकड़े चौंकाने वाली सच्चाई बयां कर रहे हैं कि विगत 13 वर्षों में सीहोर में शरबती का रकबा और उत्पादन दोनों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
बता दें सीहोर की मिट्टी और जलवायु शरबती गेहूँ के लिए वरदान मानी जाती है। इसकी चमक, स्वाद और गुणवत्ता के कारण ही मुंबई, पुणे, कोलकाता और गुजरात जैसे राज्यों के महानगरों में इसकी भारी मांग रहती है। बड़े शहरों के रईसों की थाली की शोभा बढ़ाने वाला यह गेहूं अच्छे भाव बिकता है, लेकिन अब उत्पादन घटने से इसकी मिठास कम होती दिख रही है।
49 हजार से 40 हजार हेक्टेयर पर सिमटा रकबा
कार्यालय उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग से प्राप्त जानकारी अनुसार साल 2011-12 में शरबती का रकबा 49 हजार 627 हेक्टेयर हुआ करता था, जो साल 2022-23 तक आते.आते घटकर महज 34,800 हेक्टेयर रह गया है। हालांकि बीच-बीच में रकबे में मामूली सुधार देखा गया, लेकिन कुल मिलाकर रुझान गिरावट की ओर ही है। 13 साल पहले जहां उत्पादन 1,37,318 मीट्रिक टन था, वह अब गिरकर 1 लाख मीट्रिक टन के आसपास ही सिमट कर रह गया है।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े
2011-12: 49,627 हेक्टेयर रकबा, उत्पादन 1.37 लाख मीट्रिक टन
2017-18: 42,700 हेक्टेयर रकबा, उत्पादन 1.16 लाख मीट्रिक टन
2020-21: 35,200 हेक्टेयर रकबा, उत्पादन 1.00 लाख मीट्रिक टन
2024-25: 40,390 हेक्टेयर रकबा
क्यों मोहभंग हो रहा है किसानों का
कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों का कहना है कि शरबती के रकबे में कमी आने के कई प्रमुख कारण हैं, जिसमें बेमौसम बारिश और बढ़ती गर्मी ने शरबती की चमक और गुणवत्ता पर असर डाला है। शरबती की खेती में अन्य किस्मों की तुलना में अधिक सावधानी और विशेष जलवायु की आवश्यकता होती है। अधिक पैदावार देने वाली गेहूं की अन्य नई किस्मों की ओर किसान आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि उनमें बीमारी लगने का खतरा कम होता है। बाजार में शरबती को वह प्रीमियम दाम कई बार नहीं मिल पाता, जिसकी किसान उम्मीद करते हैं।
कृषि विभाग के सामने यह चुनौती
आगामी सीजन के लिए कृषि विभाग के सामने बड़ी चुनौती है कि वह शरबती के रकबे को फिर से पुराने स्तर पर कैसे लेकर आए। विभाग नलकूपों की कमी और सिंचाई के बढ़ते संकट के बीच किसानों को पारंपरिक शरबती उगाने के लिए प्रोत्साहित करने की योजना बनाए।
कही खो न जाए पहचान
गौरतलब है कि यदि समय रहते शरबती के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब सीहोर की यह विश्वप्रसिद्ध पहचान सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगी। किसानों की मांग है कि शरबती के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं और अलग से मार्केटिंग की व्यवस्था की जाए ताकि महानगरों तक सीधे पहुंच बने और बिचौलियों का असर कम हो।