कृषि मंत्री शिवराज ने समर्थकों को दिया बड़ा संदेश…

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सीहोर। अपनी सादगी और पर्यावरण प्रेम के लिए पहचाने जाने वाले केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर समाज को बड़ा संदेश दिया है। प्रतिदिन पौधरोपण के संकल्प के पांच साल पूरे होने पर उन्होंने घोषणा की है कि अब उनका स्वागत फूलों की माला, साफे या महंगे स्मृति चिन्हों से नहीं किया जाएगा। यदि कोई उनका स्वागत करना चाहता है तो वह एक पौधा लगाए और उसकी फोटो उन्हें भेंट कर दे।
बता दें शिवराज सिंह चौहान के प्रतिदिन एक पौधा लगाने के संकल्प को गुरुवार को पांच साल पूरे हो गए हैं। उन्होंने 19 फरवरी 2021 को नर्मदा तट से इस यात्रा की शुरुआत की थी, जो आज एक जन आंदोलन बन चुकी है। इसी उपलक्ष्य में उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक संदेश के माध्यम से अपने समर्थकों को यह भावुक संदेश दिया। कृषि शिवराज ने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह तय कर रहा हूं कि अब मुझे माला और स्मृति चिन्ह की जरूरत नहीं है। मेरा स्वागत करना है तो पेड़ लगाकर आ जाना और कहना मामा, यह पेड़ लगा दिया है।
स्वागत पद का होता है, व्यक्ति का नहीं
अपनी बात को स्पष्ट करते हुए शिवराज ने बड़ी ही बेबाकी से कहा कि कई बार व्यक्ति को गलतफहमी हो जाती है कि उसका भव्य स्वागत हो रहा है, जबकि वह स्वागत व्यक्ति का नहीं, उसके पद का होता है। उन्होंने कहा जब व्यक्ति पद पर नहीं रहता तो कोई पूछने वाला नहीं मिलता। मैं इस गलतफहमी में नहीं जीना चाहता। इसलिए अब आडंबर छोड़ सीधे प्रकृति और सेवा से जुडऩे का समय है।
माला के पैसे से लगेंगे 5 पेड़
केंद्रीय मंत्री ने स्वागत पर होने वाले फिजूलखर्च का गणित भी समझाया। उन्होंने कहा कि एक स्मृति चिन्ह कम से कम 500 रुपये का आता है, जिसमें आसानी से पांच पेड़ लगाए जा सकते हैं। आजकल कपड़े का पटका (गमछा) पहनाने का भी चलन है, वह भी काफी महंगा आता है और एक बार पहनने के बाद उसका कोई उपयोग नहीं रह जाता। उन्होंने अपने मंत्रालय के अधिकारियों और संस्थाओं को भी स्पष्ट निर्देश दिए कि स्मृति चिन्हों की परंपरा बंद कर पौधरोपण पर ध्यान दें।
सीहोर में भी देखने को मिलेगी हरीभरी परम्परा
बता दें सीहोर जिले की बुदनी विधानसभा का जैत ग्राम शिवराज सिंह चौहान की जन्मस्थली है। उनका अपने गृह जिले से गहरा नाता है और महीने में उनका दो से तीन बार यहां आना-जाना लगा रहता है। हर बार समर्थक बड़ी संख्या में फलों की विशाल मालाओं और स्मृति चिन्हों से उनका स्वागत करते हैं। अब इस नए संकल्प के बाद उनके गृह जिले में स्वागत की एक नई और हरी-भरी परंपरा देखने को मिलेगी।