Sehore News: सीहोर। एक तरफ पारा 44 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है और शहरों के बंद कमरों में बैठे बड़े अधिकारी और जनप्रतिनिधि (एसी) की ठंडी हवाओं के बीच ठंडा पानी पी रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गांवों में जमीनी हकीकत बेहद खौफनाक है। यहां की जनता कडक़ड़ाती धूप में बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है। भीषण गर्मी के इस दौर में ग्रामीण इलाकों में जल संकट का ऐसा काला साया मंडराया है कि महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग दिनभर सिर्फ पानी की तलाश में भटकने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह पूरा इलाका इछावर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां से कद्दावर नेता करण सिंह वर्मा विधायक हैं, जो आठ बार के सीनियर बीजेपी विधायक होने के साथ-साथ वर्तमान में सूबे की मोहन यादव सरकार में राजस्व मंत्री जैसे बेहद रसूखदार और महत्वपूर्ण पद पर हैं। इसके बावजूद उनके अपने क्षेत्र की जनता पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए तरस रही है।
कपड़े से छानकर पी रहे मटमैला पानी
जल संकट की सबसे दर्दनाक तस्वीर ग्राम पंचायत रामगढ़ और उसके आस-पास के इलाकों से आ रही है। रामगढ़ के सरपंच प्रतिनिधि अशोक मीणा ने बताया कि गांव के जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। गांव की महिलाएं अब दूर-दराज के खेतों में बने कुओं पर जाने को मजबूर हैं। कई जगहों पर तो महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर गहरे कुओं के भीतर उतरती हैं और वहां बचे हुए मटमैले (गंदे) पानी को बाल्टियों में भरती हैं। ग्रामीण महिला रेशम बाई, गौरी बाई, कोसा बाई और गायत्री बाई ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा गांवों में वाटर लेवल पाताल तक चला गया है। हमें रोज 1 से 2 किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। कुएं इतने गहरे हैं कि पैर फिसला तो सीधे जान जाएगी, लेकिन प्यास बुझाने के लिए यह खतरा उठाना पड़ रहा है। हम इसी मटमैले पानी को कपड़े से छानकर पीने को मजबूर हैं, जिससे बच्चे बीमार हो रहे हैं।
बजट की ‘कटौती’ ने जनता का कंठ सुखाया
इस भीषण संकट के पीछे सिर्फ प्रकृति का प्रकोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सरकारी लापरवाही भी बड़ी वजह है। किसान और समाजसेवी एमएस मेवाड़ा ने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि सरकार ने इस बार पीएचई विभाग के बजट में भारी कटौती कर दी है। ग्रामीणों को विभागीय अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक इस साल पीएचई विभाग को पूरे जिले के लिए सिर्फ 30 नए नलकूप खनन का लक्ष्य और बजट दिया गया है। अगर पिछले साल से तुलना करें तो पिछले साल 100 नलकूपों का लक्ष्य था। यानी इस बार बजट में सीधे 70 फीसदी की कटौती की गई है। बजट न होने के कारण अधिकारी हाथ खड़े कर चुके हैं और संकटग्रस्त गांवों में नए बोर नहीं हो पा रहे हैं।
मुख्यमंत्री से गुहार, मांग पूरी न होने पर आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों का कहना है कि वे इस समस्या को लेकर प्रशासन को कई बार आवेदन दे चुके हैं, लेकिन अफसरों द्वारा गंभीरता नहीं दिखाईजा रही है। हालांकि समाजसेवी एमएस मेवाड़ा के माध्यम से मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, पीएचई मंत्री और जिले की प्रभारी मंत्री तक नवीन नलकूप खनन की मांग और शिकायत भेजी जा चुकी है। ग्रामीणों ने सरकार से दो प्रमुख मांगें की हैं पीएचई विभाग का बजट तत्काल बढ़ाया जाए। भीषण गर्मी को देखते हुए सीहोर जिले के लिए कम से कम 100 से अधिक नए नलकूप खनन की विशेष स्वीकृति दी जाए। रामगढ़ सहित प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर गांवों में पानी की व्यवस्था नहीं की तो वे सडक़ों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।


