Sehore News: सीहोर। धार्मिक आस्था के नाम पर नदियों को प्रदूषित करने के बढ़ते मामलों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। भैरुंदा क्षेत्र में नर्मदा नदी में भारी मात्रा में दूध बहाने और साडिय़ां विसर्जित करने के एक मामले को एनजीटी ने पर्यावरणीय अपराध माना है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए हैं और दोनों ही बोर्डों से जवाब तलब किया है।
एनजीटी में दायर याचिका के अनुसार यह पूरा मामला जिले की भैरूंदा तहसील के सातदेव और भैरूंदा के गांवों का है। यहां आयोजित एक बड़े धार्मिक आयोजन के समापन के दौरान आयोजकों द्वारा नर्मदा नदी में आस्था के नाम पर 11 हजार लीटर दूध बहाया गया था। इसके साथ ही नदी की धारा में 211 साडय़िां भी विसर्जित की गईं।
याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल को बताया कि इतनी बड़ी मात्रा में जैविक और सिंथेटिक सामग्री नदी में डालने से नर्मदा नदी का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। इसके कारण पानी दूषित हो रहा है, जलीय जीवों की जान खतरे में पड़ रही है और नदी के आसपास की कृषि भूमि के भी प्रदूषित होने की आशंका पैदा हो गई है।
कानूनन अपराध है नदी में दूध बहाना
मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली बात को केन्द्रित किया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास विशेष रूप से नदियों में दूध बहाने को प्रतिबंधित करने वाले कोई अलग या विशिष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।
नदियों में ऐसी सामग्री डाला प्रतिबंधित
एनजीटी ने साफ किया कि जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 24 के तहत नदियों में किसी भी ऐसी सामग्री को डालने की सख्त मनाही है, जो पानी को प्रदूषित करती हो। दूध एक जैविक पदार्थ है और जब यह बड़ी मात्रा में पानी में मिलता है तो पानी की बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड को अत्यधिक बढ़ा देता है। इसके कारण पानी में घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर तेजी से कम हो जाता है, जो जलीय जीवों के लिए जानलेवा साबित होता है। इसलिए यह कृत्य सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।
एनजीटी ने दिए वैज्ञानिक जांच के आदेश
मामले को गंभीरता से लेते हुए एनजीटी ने सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आदेश दिया है कि वे विशेषज्ञों के माध्यम से इस पूरे मामले का वैज्ञानिक डेटा एकत्र करें। ट्रिब्यूनल ने इन बिंदुओं पर विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है, जिनमें क्या अनुष्ठानों के दिन नदी में इतनी बड़ी मात्रा में दूध बहाने से पानी की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ा। क्या इस कृत्य से नर्मदा नदी के जलीय जीवन और मछलियों को नुकसान पहुंचा है। क्या भविष्य में इस प्रकार की धार्मिक व सामाजिक गतिविधियों को रोकने या विनियमित करने के लिए नए नियमों या कड़े दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है।
अगली सुनवाई 17 जुलाई को
एनजीटी ने दोनों प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को निर्देश दिया है कि वे अपनी वैज्ञानिक रिपोर्ट और जवाब जल्द से जल्द ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करें। इस संवेदनशील और पर्यावरण से जुड़े बड़े मामले की अगली सुनवाई अब 17 जुलाई को तय की गई है। इस मामले के बाद अब देश भर की नदियों में धार्मिक आयोजनों के नाम पर खाद्य सामग्री और कपड़े विसर्जित करने की परंपराओं पर नए नियम बनने की उम्मीद जताई जा रही है।


