सीहोर। आस्था, परंपरा और उल्लास के संगम के साथ आज शहर की पावन धरा पर महादेव की होली का शंखनाद हो गया। अंतर्राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के सानिध्य में आयोजित इस महोत्सव ने सीहोर को भक्ति के उन रंगों में सराबोर कर दिया है, जिसकी चमक अब काशी और मथुरा की तर्ज पर विश्व पटल पर दिखाई दे रही है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता नवाबी दौर की पुरानी बंदिशों को तोडक़र सीवन तट के प्राचीन 108 शिवालयों की उस गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करना है, जहां होली का अर्थ केवल हुड़दंग नहीं बल्कि महादेव को एक लोटा जल और गुलाल अर्पित करना है।
पंडित प्रदीप मिश्रा प्राचीन इतिहास बताते हुए कहा कि सीवन नदी के तट पर स्थित सिद्धपुर नगर में प्राचीन काल में 108 शिवालय हुआ करते थे। उस दौर में भक्त बाबा को एक लोटा जल और गुलाल चढ़ाकर होली मनाते थे, लेकिन नवाबों के शासनकाल में इस मंदिर वाली परंपरा को बंद कर दिया गया था और होली का स्वरूप बदलकर नवाबों के सामने प्रदर्शन तक सीमित कर दिया गया था। पंडित मिश्रा ने इसी पुरानी और थोपी गई प्रथा को बदलकर फिर सेे महादेव की होली की शुरुआत की है।
चमत्कारेश्वर से मनकामेश्वर तक फूलों की वर्षा
होली का यह भव्य कारवां छावनी स्थित चमत्कारेश्वर महादेव मंदिर से शुरू हुआ। इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पानी की बर्बादी या पक्के रंगों का डर नहीं है, यहां केवल फूलों ूलों की खुशबू और शुद्ध गुलाल का उपयोग किया जा रहा है। यह यात्रा गुप्तेश्वर, पिपलेश्वर और नर्मदेश्वर महादेव मंदिर होते हुए प्राचीन मनकामेश्वर मंदिर पहुंचेगी, जहां विशेष महाआरती के साथ इसका समापन होगा।
शिव की भक्ति का रंग है अजर-अमर
श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पंडित मिश्रा ने कहा महादेव का रंग वो है जो एक बार चढ़ जाए तो जीवन भर नहीं उतरता। शिव और गुरु के सानिध्य में मनाई जाने वाली यह होली संदेश देती है कि अपनों के साथ खुशियों के रंग बांटे। उन्होंने देशभर के भक्तों से आह्वान किया कि वे अपने नजदीकी शिवालयों में जाकर भगवान शिव को चंदन युक्त जल अर्पित करें और सात्विक व अनुशासित तरीके से त्योहार मनाएं।


