मेवाड़ा राजपूत समाज ने बदली परंपरा, होली पर नहीं बंटे बर्तन-बताशे

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सीहोर। समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में मेवाड़ा राजपूत समाज ने एक मिसाल पेश की है। जिले के चन्देरी सहित करीब 15 गांवों के समाज बंधुओं ने सामूहिक निर्णय लेते हुए होली के पर्व पर बताशे और बर्तन देने की दशकों पुरानी परंपरा को पूरी तरह बंद कर दिया है। समाज का मानना है कि यह कदम न केवल फिजूलखर्ची रोकेगा, बल्कि समाज के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को संबल भी प्रदान करेगा।
मेवाड़ा राजपूत समाज के जिला अध्यक्ष नारायण सिंह पटेल एवं समाजसेवी एमएस मेवाड़ा ने बताया कि होली पर गमी वाले परिवारों के यहां रिश्तेदारों को बर्तन और बताशे देने की रीत एक सामाजिक बोझ बनती जा रही थी। इसे बंद करने का निर्णय समाज की एकजुटता और प्रगति को ध्यान में रखकर लिया गया है। पदाधिकारियों के अनुसार इस प्रथा से अनावश्यक दिखावा बढ़ रहा था, जिसे अब तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है।
समाज में हित में लिया निर्णय
समाजजनों ने बताया कि इस प्रथा के चलते समाज में मध्यम और गरीब परिवारों को अनावश्यक खर्च से बचाना। ऊंच नीच और दिखावे की प्रतिस्पर्धा को खत्म कर सरलता लाना। नई पीढ़ी को फिजूलखर्ची के बजाय रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करना। सामाजिक एकता को मजबूत कर मिसाल पेश करना है।
इन गांवों ने लिया संकल्प
इस मुहिम में ग्राम चन्देरी, रायपुरा, फंदा, कोडिय़ा, बिलकिसगंज, छापरी, सेवनिया, बड़वेली, थूना, खामलिया, चोन्डी, तज, अमरौद, रामाखेड़ी और अल्हादाखेड़ी जैसे गांवों के ग्रामीणों ने एक स्वर में अपनी सहमति दी है। समाज के इस फैसले की चारों ओर सराहना हो रही है।