एक लेखक और सामाजिक चिंतक के रूप में जब भी परिवार शब्द मेरे मन में उभरता है तो सबसे पहले मेरी स्मृतियों के आकाश पर गायत्री परिवार का नाम उज्ज्वल हो उठता है। यह नाम केवल एक संगठन का परिचय नहीं देता, बल्कि सेवा, संस्कार, साधना, समर्पण और विश्वबंधुत्व की उस जीवनदृष्टि का स्मरण कराता है, जिसने लाखों लोगों के जीवन को दिशा दी है। गायत्री परिवार का नाम आते ही मन आनंद की फुहारों से भीग उठता है और मैं अनायास ही उससे जुड़ी अपनी पुरानी स्मृतियों, प्रेरक प्रसंगों और आत्मीय अनुभवों में खो जाता हूं।
मध्यरात्रि से प्रारंभ हुई वर्षा की कोमल फुहारों ने जैसे ही खिड़कियों तक अपनी दस्तक दी, मन अनायास ही आनंद से भर उठा। लंबे इंतजार के बाद आई यह रिमझिम वर्षा केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति के जीवन-संगीत का मधुर आरंभ है। सावन का महीना अपने साथ केवल बादल और वर्षा ही नहीं लाता, बल्कि आस्था, संस्कृति, कृषि, प्रकृति और मानव जीवन को जोडऩे वाले अनेक पर्वों का संदेश भी लेकर आता है।
सिंधी समाज का पावन चालीसा पर्व प्रारंभ हो चुका है। इसके पश्चात रक्षा बंधन का स्नेहिल पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम का संदेश देगा। जैन धर्म में मुनिराजों के चातुर्मास की स्थापना आत्मशुद्धि, संयम और साधना का वातावरण निर्मित करेगी। इसी समय खेतों में धान की बोनी आरंभ होती है, नदियों का आंचल भरने लगता है और सूखी धरती पर हरियाली का पहला अंकुर फूट पड़ता है। पतझड़ के बाद फूलों का खिलना भले अभी दूर हो, किंतु उसके स्वागत की तैयारी प्रकृति अभी से प्रारंभ कर देती है।
वास्तव में भारतीय संस्कृति के अधिकांश पर्वों की आत्मा सावन में ही बसती है। यह केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि नवसृजन, नवचेतना और नवजीवन का उत्सव है।
आज जब यूरोप सहित विश्व के अनेक देशों में भीषण गर्मी, हीट वेव और जलवायु परिवर्तन की चिंताजनक खबरें सामने आ रही हैं, तब भारत में इंद्रदेव की कृपा से अमृत तुल्य वर्षा धरती को जीवनदान दे रही है। ऐसे समय मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है, क्या यह वर्षा सदा इसी प्रकार धरती का आंचल भिगोती रहेगी। क्या धरती मां हमेशा मनुष्य, पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जगत की प्यास बुझाती रहेगी। क्या हमने कभी अपनी इस मां के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया है।
धरती मां का सबसे सुंदर आभूषण उसकी हरियाली है। घने वन, विशाल वृक्ष, लहलहाते खेत, कल-कल बहती नदियां और चहचहाते पक्षी ही उसके वास्तविक गहने हैं। यदि हम यही आभूषण उससे छीन लें तो क्या उससे सुख, समृद्धि और जीवन की अपेक्षा करना उचित होगा।
सौभाग्य से आज भी ऐसे संगठन हैं जो धरती मां का खोया हुआ श्रृंगार लौटाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उनमें अखिल विश्व गायत्री परिवार अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वर्षों से गायत्री परिवार वृक्षारोपण को केवल पर्यावरणीय अभियान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना और युगधर्म मानकर कार्य कर रहा है। प्रत्येक पौधा उनके लिए एक यज्ञ है, प्रत्येक वृक्ष एक तपस्या है और प्रत्येक हरित अभियान भावी पीढिय़ों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प है।
लोक में एक कहावत प्रचलित हैकृसावन का चौका चूक गया तो फिर जीवनभर पछताना पड़ता है। यह केवल खेती के लिए नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक श्रेष्ठ अवसर के लिए भी उतनी ही सार्थक है, जो समय पर बीज बोता है, वही भविष्य में हरियाली और समृद्धि का आनंद प्राप्त करता है।
इसी प्रेरणा को मूर्त रूप देते हुए परम वन्दनीया माताजी एवं अखण्ड दीप शताब्दी वर्ष 2026 के पावन अवसर पर सॉमल माता को समर्पित 1111 पौधा रोपण महायज्ञ एवं वृक्ष गंगा अभियान का आयोजन किया जा रहा है। यह केवल पौधे लगाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और आने वाली पीढिय़ों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का महायज्ञ है।
कार्यक्रम की रूपरेखा
कार्यक्रम: 1111 पौधा रोपण महायज्ञ एवं वृक्ष गंगा अभियान
समर्पण: परम वन्दनीया माताजी एवं अखण्ड दीप शताब्दी वर्ष 2026 के अंतर्गत सॉमल माता को समर्पित
दिनांक: 23 जुलाई, गुरुवार
समय: प्रात: 8.00 बजे
स्थान: बड़ली वाली सॉमल माता मंदिर, रायपुरा जिला सीहोर
विशेष लक्ष्य
- 1111 पौधों का रोपण
- सॉमल माता पहाड़ी पर सघन वृक्षारोपण
- हरित पर्वत एवं जल संरक्षण का संकल्प
मुख्य अतिथि
डॉ. चिन्मय पंड्या जी
प्रतिकुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, हरिद्वार उत्तराखण्ड
सहभागिता का आह्वान
अपने जीवन के पावन अवसरों को प्रकृति से जोडि़ए। - जन्मदिन पर एक पौधा लगाइए।
- विवाह वर्षगांठ पर हरित उपहार दीजिए।
- अपने पितरों एवं प्रियजनों की पुण्य स्मृति में श्रद्धासुमन स्वरूप वृक्षारोपण कीजिए।
आज लगाया गया एक पौधा आने वाली पीढिय़ों को शुद्ध वायु, छाया, जल और जीवन प्रदान करेगा।
हमारी सांस्कृतिक विरासत
अपने ग्राम, नगर एवं तीर्थस्थलों के देवस्थानों को पुन: हरित और जागृत बनाने के लिए… - त्रिवेणी: पीपल, बरगद, नीम
- हरिशंकरी: पीपल, बरगद, पाकड़
- पंचवटी: पीपल, बरगद, अशोक, बेल एवं जामुन
जैसी पवित्र वाटिकाओं की स्थापना का संकल्प लें।
प्रेरक संदेश
बूढ़ा बरगद, पीपल नाना, तुमने इन्हें नहीं पहचाना।
वृक्षों की यदि लोगे जान, धरती होगी रेगिस्तान।
करते उन्हें प्रणाम हैं, पेड़ नहीं भगवान हैं।
जो भी पेड़ लगाएगा, नाम अमर कर जाएगा।
गायत्री परिवार केवल यज्ञ, पूजा, संस्कार अथवा गौसेवा तक सीमित नहीं है। उसकी सोच वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से प्रेरित विश्वबंधुत्व की है। शिक्षा, संस्कार, नशामुक्ति, महिला सशक्तिकरण, युवा जागरण, ग्राम विकास, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, स्वास्थ्य और मानवीय मूल्यों के संवर्धन जैसे अनेक क्षेत्रों में यह परिवार वर्षों से निस्वार्थ सेवा कर रहा है।
आइए, इस सावन में केवल वर्षा का आनंद ही न लें, बल्कि धरती मां का श्रृंगार लौटाने का संकल्प भी लें। एक पौधा लगाएं, उसका संरक्षण करें और उसे वृक्ष बनने तक अपने परिवार के सदस्य की तरह स्नेह दें।
आइए हम सब मिलकर सॉमल माता की पावन पहाडिय़ों को फिर से हरित आभा से आलोकित करें। यही धरती मां की सच्ची सेवा है, यही आने वाली पीढिय़ों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व और यही मानवता का सबसे बड़ा यज्ञ है।
इस रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का पर्व नहीं, बल्कि हर उस संबंध की रक्षा का संकल्प है, जो हमारे जीवन को सुरक्षित और समृद्ध बनाता है। इस वर्ष आइए, रक्षाबंधन से पहले धरती मां, वृक्षों और हरियाली की रक्षा का संकल्प लें।
वृक्षारोपण करें, यही प्रकृति की कलाई पर बांधा गया सच्चा रक्षा-सूत्र होगा। जब वृक्ष सुरक्षित रहेंगे, तभी जल सुरक्षित रहेगाय जब जल सुरक्षित रहेगा, तभी जीवन, पर्यावरण और आने वाली पीढिय़ों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
आइए इस रक्षाबंधन से पहले ऐसा बंधन बनाएं जो केवल धागों तक सीमित न हो, बल्कि धरती, प्रकृति और हरियाली की रक्षा का आजीवन संकल्प बन जाए।
संपर्क सूत्र: 425492970, 7974959891, 9826358958, 9993420990, 9425650163, 9926352350, 9993638460
आयोजक: अखिल विश्व गायत्री परिवार एवं रायपुरा, सेमरादांगी, दीपड़ा, जमुनिया, थूनाखुर्द, नोनीखेड़ी, खामलिया, डोबरा, बड़बेली, दुपाडिय़ा, मुहाली, बड़ी मुंगावली, राजूखेड़ी, सेमली, जाखाखेड़ी तथा समस्त सॉमल माता क्षेत्रवासी जिला सीहोर।
सुशील कुमार जैन, लेखक एवं स्तंभकार


