सीहोर। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर का हिसाब-किताब और वित्तीय लेखा जोखा सार्वजनिक होने के बाद अब प्रसिद्ध सलकनपुर स्थित मां विंध्यवासिनी बीजासन देवी मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब उज्जैन महाकाल मंदिर का हिसाब सार्वजनिक हो सकता है तो सलकनपुर ट्रस्ट वित्तीय वर्ष 2025-26 के आय-व्यय की जानकारी सार्वजनिक करने से क्यों कतरा रहा है।
अब श्रद्धालुओं में यह बात चर्चा का मुख्य कारण बन गई है कि डॉ. मोहन यादव सरकार आखिर बुधनी क्षेत्र में इतनी बेबस क्यों नजर आ रही है। मंदिर अधिनियम के नियमों को ताक पर रखकर पिछले 20 सालों से एक ही व्यक्ति (महेश उपाध्याय) को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाकर क्यों बिठाया गया है। क्या इस पद के लिए कोई दूसरा काबिल व्यक्ति नहीं है।
अधिनियम कहता है 3 साल, यहां बीत गए दो दशक
सलकनपुर मंदिर के सुव्यवस्थित संचालन के लिए भोपाल राज्य सलकनपुर मंदिर अधिनियम 1956 लागू किया गया था। इस कानून के तहत किसी भी ट्रस्ट अध्यक्ष का कार्यकाल केवल 3 वर्ष निर्धारित किया गया है, ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता रहे और नए लोगों को मौका मिले। लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए महेश उपाध्याय 11 अगस्त 2005 से लगातार इस पद पर काबिज हैं। बताया जाता है कि महेश उपाध्याय को पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का बेहद करीबी माना जाता है। यही कारण रहा कि शिवराज सिंह चौहान के हर कार्यकाल के दौरान नियमों को शिथिल कर महेश उपाध्याय की दोबारा ताजपोशी की जाती रही। लेकिन अब राज्य में सत्ता परिवर्तन और डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इस व्यवस्था की समीक्षा न होना लोगों को हैरान कर रहा है।
कमलनाथ सरकार ने हटाया था, 24 घंटे में पलटा फैसला
ट्रस्ट के इतिहास पर नजर डालें तो साल 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने महेश उपाध्याय को हटाकर भोपाल के पूर्व पार्षद सुधीर गुप्ता को अध्यक्ष नियुक्त किया था। लेकिन तब बाहरी व्यक्ति का तर्क देकर स्थानीय स्तर पर भारी विरोध प्रदर्शन कराया गया। दबाव में आकर सरकार ने 24 घंटे के भीतर आदेश वापस ले लिया और कमान प्रशासन को सौंप दी गई थी। साल 2020 में जैसे ही शिवराज सरकार की वापसी हुई, महेश उपाध्याय को दोबारा अध्यक्ष पद सौंप दिया गया।
70 सालों में बदले कई नाम, फिर क्यों थमा पहिया
वर्ष 1956 में ट्रस्ट की स्थापना के बाद से पहले अध्यक्ष वंशीधर पाराशर बने थे। इसके बाद स्वामी नरेंद्र दास, दरबार हेमराज, मनोहर लाल माहेश्वरी, मंगल सिंह ठाकुर, पं. जगदीश नायक और विष्णु प्रसाद ठाकुर सहित कई दिग्गजों ने कमान संभाली, लेकिन पिछले 20 सालों से यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी तरह थम चुकी है।
करोड़ों का चढ़ावा, फिर भी सुविधाओं के नाम पर सिफर
हर साल सलकनपुर धाम में मां के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे मंदिर को भारी-भरकम आय होती है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के लिए रुकने की पर्याप्त व्यवस्था, पेयजल, स्वच्छ शौचालय, विश्राम स्थल, पार्किंग और शेड जैसी मूलभूत सुविधाएं आज भी एक बड़ी चुनौती हैं।
बोरियों में भरकर चोरी हुआ था दान
यह मंदिर प्रबंधन पहले भी अपनी घोर लापरवाही को लेकर दागदार हो चुका है। वर्ष 2022 में मंदिर के स्ट्रॉन्ग रूम का ताला तोडक़र चोर दान के पैसों से भरी 6 बोरियां चुरा ले गए थे। अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के बीच सलकनपुर की यह पुरानी घटना फिर से जनचर्चा में है।


